Description
जैसे उस वृक्ष के साथ हमारा रिश्ता ‘ॐ’ की ध्वनि से बना, वैसे ही आपका रिश्ता इस अस्तित्व के साथ ‘तर्क’ और ‘तजुर्बे’ से बनेगा।” आज की दुनिया में जब हमें कहीं भी जाना होता है, हम बिना सोचे-समझे अपना फोन निकालते हैं और ‘Google Map’ खोल लेते हैं। हम उस मैप पर भरोसा करते हैं क्योंकि वह हमें तार्किक दिशा दिखाता है, वह हमें भटकने से बचाता है और हमें हमारी मंजिल तक पहुँचाता है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जीवन की यात्रा में हम कहाँ खड़े हैं? हम अपनी मान्यताओं, अपने धर्म और अपनी आस्था के उस रास्ते पर चल तो रहे हैं, जिसे हमारे पूर्वजों ने बनाया था, लेकिन क्या हमारे पास उसका कोई ‘मैप’ है? या हम सिर्फ अपनी आँखें बंद करके भीड़ के पीछे भाग रहे हैं? यहीं से इस पुस्तक का जन्म हुआ।




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